श्रीवीर स० २४६२

वत्रु० से

ई० से का पे १६६६.

प्रास्ताविक दो शब्द

पट्टावलीपराग ग्रन्थ मे दो पद्ठावलियां सूत्रोवत हैं, पहली पर्यूषणाकल्प सूत्रोवत भ्रौर दूसरों नन्दीसूत्र के प्रारम्भ में लिखी हुई श्रनुयोगधरो की परम्परा

इन सूत्रोक्त पद्टावलियो के आगे दिग्रम्बर सम्प्रदाय की कतिपय पट्टावलियो की चर्चा करके प्रथम परिच्छेद की समाप्ति की है।

द्वितीय परिच्छेद मे मुख्य रूप से तपागच्छ की धर्मंसागर उपाध्याय- कृत पट्टावली दी है ओर उसके बाद तपागच्छ की श्रनेक शाखा-पट्टावलियां श्रौर भ्रन्यान्य प्रकीणंक गच्छों की पट्टावलिया देकर दूसरा परिच्छेद पूरा किया है

तीपरे परिच्छेद मे केवल खरतर-गच्छ की १२ पद्ठावलि-युर्वावलियां देकर इसे भी पूरा किया है

चतुर्थ परिच्छेद मे लौंकागच्छ, वाईस सम्प्रदाय और कडवामत की पट्टावलियां दो हैं

ग्रन्थ का नाम हमने “पद्ठावलीपराग” दिया है, क्योकि प्रत्येक पद्टावली श्रक्षरशः लेकर उसका मुख्य सारभाग लिया है। पटद्ठावलियो में जहा-जहां समालोचना की श्रावश्यक्रता प्रतीत हुई वहा सवेत्र समालोचना गर्भित उसके गुण-दोषो की चर्चा भी करनी पड़ी है, हमारा उद्देश्य किसी भी पट्टावली के खण्डन-मण्डन का नहीं था, फिर भी जहां-जहां जिनओे

[तीन

टीका टिप्पण करने की आवश्यकता प्रतीत हुई वहां उन पर टीका-टिप्पणी भी की है, यह वात पाठकरगण को पढने पर स्वयं ज्ञात होगी कई पट्टावलि लेखकों ने अपनी पट्टावलियो मे अपने आचायों और उनके कर्तव्यो के निरूपण में वास्तविकता से शताधिक श्रतिशयोक्तिया कर मर्यादा का उल्लघन किया है। ऐसे स्थलो पर आलोचना करना जझरी समझ कर हमने वही सत्य बातें लिख दी है। हमारा श्रभिप्राय किसी गच्छ की पट्टावली का महत्त्व घटाने का नही पर वास्तविक स्थिति बताने

का था। इसलिए ऐसे स्थलो को पढ़कर पाठक महोदय अपने दिल मे दुख भ्रथवा रागद्वेंष को भावना लायें

पट्टावही पराग की विशेषता :

पट्टावलिप्रा तो अनेक छपी हैं और छपेंगी, पर एक ही पुस्तक में छोटी-बड़ी ६४ पट्टावलिया श्राज तक नहीं छपी। सौत्र-पट्ावलियो के प्रतिरिक्त “पराग सग्रह” में वृहद्गच्छोय, तपागच्छीय, खरतर- गच्छीय, पोर्णमिक-गच्छी य, साधु पोर्ण मिक-गच्छीय, अचल-गच्छीय, आगमिक-गच्छीय, लघु पौषध दालिक, बृहत्‌ पौषध शालिक, १० पल्लिवाल-गच्छीय, ११ ऊकेशगच्छीय, १२ लॉकागच्छीय, १३ कटुक- मतीय, १४ पाइवेचन्द्रगच्छीय, १५ बाईस सम्प्रदाय की और तेरा पथ आ्रादि की मिलकर ६४ पट्टावलिया 'पद्ावली-पराग' मे संगृहीत हैं

अन्य पट्टावलियो के पढने से प्रायः गच्छो की ग्रुरुपरम्पराओ श्रौर उनके समय का ही पता लगता है पर “पट्टावली-पराग” क्के पढने से उक्त वातो की जानकारी के उपरान्त किन-किन गच्छी की उत्पत्ति में कौन-कौन

हुई ? श्री विजयसेन भरूरिजी के पट्ट पर श्री राजविजय सूरिजी शभौर विजय- हौर सूरिजी दो आचार्य किन के भ्रपँच से बंठे ? और ब्रह्मऋषि ने किसके का कि कक निकाला इत्यादि अश्वुतपृर्वं भौर रसपूर्णे बातो _पट्टावली-पराग” से पाठक्रों को भामाशिक रूप में न्प में मिल घार ] कम

आंखों की कमजोरी और प्रत्येक फार्म का प्रूफ अपने पास मंगवाने पर ग्रन्थ के मुद्रण मे समय बहुत लग जायगा इस विचार से प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रफ सुधारने का कार्य ब्यावर के एक जैन विद्वान्‌ को सौपा था और प्रारम्भ में प्रूफ संशोधन ठीक ही हुआ है पर नियुक्त पडितजी के दुसरे व्यक्ति को प्रूफ देखने का कार्य सौप कर मास भर तक शअन्यत्र चले जाने के बाद मे नये प्रूफ रीडर के संशोधन मे श्रशुद्धियां श्रधिक रह गई है, कुछ भ्रशुद्धियां घिसे हुए रद्दी टाइपो के इस्तेमाल करने से भी बढ़ी हैं यह पाठकगरणु को स्वय ज्ञात हो जायगा

हमने प्रूफ रीडिग की और टूटे घिसे टाइपो के कारण से हुई प्रणुद्धियां भी शुद्धिपत्रक मे ले ली है, पाठक महाशय जहा कही अक्षर सम्बन्धी स्थल शक्तित जान पड़े वहां शुद्धिपत्रक देख लिया करे।

... पाँच

विषयानुक्रम

प्रथमपरिच्छेद | सीत्रपट्टावलियां |

मगलाचरण कहप-स्थविरावली ( उपोदघात ) कुल गण झौर घाखाएँ मूल कल्प-स्थविरावली सनुवाद

श्रीदेवद्धिगरिण की गुरु-परम्परा कल्प-स्थविरावली की प्राचीनता की कसौटी गण शाझा कुलो में परिमार्जेन

स्थविरावली की प्राचीनता

नदी स्थविरावली सानुवाद

माथुरी वाचनानुगत स्थविर क्रम वालभी-वाचनानुगत स्थविर क्रम प्रीदेवद्धिगणि क्षमाश्रमण को गुर्चावलों इवेताम्वर जेनो के श्रागम

निह्ृवों का निरूपण

प्राचीन स्थविर-कल्पी घैनश्रमणो का आचार घ्वेताम्वर सम्प्रदाय की प्राचीनता फपामप्राभृतकार युणघर ग्ाचार्य इवेताम्वर थे वापनोय क्षिवभूति के वशज ये

शिवभूति से दिगम्बर सम्प्रदाय का प्रादुर्भाव

छठ]

पृष्ठ से

१० र४ ३१ शेर रेरे हेड 4० डशू डेश ४६घ६ ४४ भर. ४६ ६० ६१ ६१ घर ६९५६ दुछ झरे घर घपघदघू छछ घूषण &०9 ६१ €३ तट ६७

कुन्दकुन्द के गुरु पृष्ठ €पसे ६६

झाचार्य कुन्दकुन्द का सत्तासमय १०० १०७ भट्टारक जिनसेनसूरि का शकसवत्‌ कलचूरी संवत्‌ है १०८ १०९ प्राघुनिक दिगम्बर समाज के संघटक आचार्य कुन्दकुन्द - झौर भट्टारक वीरसेन ११० ११४ दिगम्ब्रर सम्प्रदाय की पट्टावलियां ११५ १२४ नन्‍्दीस्ध द्रमिलगण भ्रुद्भधलान्वय की पट्टावलियां १२४ १२४ देशोयगरण के आाचार्यों को परम्परा श्र्८ १२५ लेखनं ५४ में निदिष्ट झ्राचार्यंपरम्परा १२५ १२६ मूलसघ के देशो यगरण की पट्टावली १२७ मूलसंघ के नन्दीगण की पट्टावली १२७ १२८ उपसंहार श्र्दष. १२६ द्वितीय परिच्छेद [ तपागच्छीय पट्टाबलियां ] श्री तपागच्छ-पद्ावलीसूत्र १३३ १५५ तपा गस॒पति-गुण पद्धति १५४६ १६२ तपागच्छ पट्टावली सूत्रवृत्ति अनुसंधितपूरत्ति दूसरी १६३ १६६ पट्टावलीसा रोद्धार १६७ १६८ श्री वृहत्‌ पोषधशालिक पट्टावली १६९ १७३ बृहत्‌ पोषधशालीय आचारयों की पट्ट-परम्परा श्छ४ १८१ लघु पौषधशालिक पद्टावली # ; श्वर १८६ तपागच्छ कमल-कलश शाखा की पट्टावली १८७ राजविजययसूरि गच्छ की पट्टावली श्पय १६५ श्री रत्नविजयसूरिजों श्रौर इनकी परम्परा १६६ १६६ विजयदेवसूरि के सामने नया आचाये क्‍यों बनाया ? २०० २०४ विजयानन्दसूरि गउछ की परम्परा (१) २०४५ २०७ विजयानन्दसूरि शाखा की पट्टावली (२) २०८ २०६ विजय आनन्दसूरि शाखा की पट्टावली (३) २१० विजयानन्दसूरि शाख वलो (४) २११

[ साक्त !

तपागच्छ सागर शाखा-पट्टावली (१) पृष्ठ २१२ से सागरगच्छीय पट्टावली (२) २१३ २१४ सागरगच्छ के प्रारम्भिक श्राचार्यों का तामकम (३) २१५ परिशिष्ठ (१) «८ २१६ तपागच्छ की लघु अ्रपूर्ण पट्टावलिया २१६ २६८ तपगच्छ पाट-परम्परा स्वाध्याय २१६

श्री तपगच्छीय पट्टावली सज्ञ्ञाय २१६ २२२ विजयरत्नसूरि के चातुर्मास्यो के गावो की सूची २२२ २११३ आचार्य विजयक्षमासूरि के चातुर्मायो की सूची २९३ २१५४ विजय स्विग्नशाखा की गुरु-परम्परा २२५

सागर सविग्त शाखा की गुरु-परम्परा २२६

विमल सविग्न शाखा की गुरु-परम्परा २२७

श्री पाइवंचन्द्र गच्छ की पट्टावली (१) २२८

श्री पादव चन्द्र गच्छ नाम पडने के वाद की झचार्य-परम्परा २२६ पाइवेचन्द्र गच्छ की लघु-पद्ठावली (२) २३० दृहद्‌-गच्छ गुर्वावली २३१ २३३ श्री ऊकेशनाच्छीया पट्टावली २३४ २३८ पोर्णमिक गरच्छ की ग्रुस्वावली २३६ (अचलग्रच्छ की पट्टावली २४० २४३ 'पह्िवाल-गच्छीय पट्टावली २४४ २५२

तृतीय परिच्छेद [ खरतरगच्छ की पहुंं॒लियां ]

'खरतरगच्छ पट्टावली-संग्रह २५५ २५७ खरतरगच्छ वृहद-गुरुवावली * भ्रू८ एछद ' वर््धमानसूरि से जिनपद्मसूरि तक के शाचायों की वृहद्गुवविल्लि २७४७ ३४३ राजाझों का मोह * ३४३ ३४५ हस्तलिखित खरतरगच्छीय पट्टावलियाँ...» - ३४६ ३४८ सोलंकी राजाओं की वश्चावली प्ौरे खरतरः व्रिद - कृध: ३५३ (६) पह्टावली चवम्बर २३२७ ६४५ ३५६ भाठ

प्रथम परिच्छेद

[ सोन्र-पद्टावलियाँ ]

पृ] री

वर्धभान॑ जिन॑ नत्या, वर्घमानगुरं.दघिस्‌ पट्टावली-परागस्य,.. संग्रहोध्य॑ विवीयते ॥१

दशाश्रुता5ष् माध्याये, कल्पाध्ययनवामलि स्थविरावलिका हृब्वा, प्राच्यें: सा प्रथमा सता ॥२७ नग्दीमज्भूलमध्यस्था, वाचकानासथावलिः

एबा वाचक्ंशध्य, द्वितीया स्थविरावली स्थविरावलिकायुस्मं, सौन्रमेतत्प्रकोतितम्‌ ग्रत्र॒ दिगम्बरास्ताय-संक्षपोपि प्रदर्शित। 0४४७ चन्द्रकुलोख्धवादग्ने, सुरिपट्टपरम्परा क्चिद्‌ भिन्ना क्वाप्यशिन्ना, “तपागच्छ” सत्ताहता 0४५७ श्रनेकगच्छसंबद्धा: पटद्टावल्यः प्रकीर्णंकाः ।॥ सस्पूर्णा; खण्डिता बाषि, यथालब्धास्तथाइ5हता: ७६ झाचारयवर्घभानाद्धि, खरभाषिसताः स्थृताः गुर्वावल्य.. प्रबन्धादि-पद्टावल्यों. छनेकथा 0७७ लक्ष-लेखक-कड्वादि-गृहस्थमतविस्तृतस्‌ पद्टावलीद्ययं प्रान्ते, विस्तरेरप विवेचितम्‌ 0

भ्रथ॑ : बढ़ते हुए गुणों के समुद्र ऐसे श्रीवर्धभान जिनको नमन करके पट्टावलियों के सार का यह संग्रह किया जाता है। दशाश्रुतस्कन्ध के भ्रष्टमाध्ययत्त मे, जिसका नाम “पर्युषणा कल्पाध्ययन” है, पूर्वाचार्यों ने स्थविरावली वनाकर उसके अन्तर्गत की, उसको हम “प्रथम स्थविरावली” मानते हैं। नन्‍दी सूत्र के मगलाचरण मे अनुयोगधरों की जिस वाचकपरम्परा

४] [ पद्मावली-पराम 8 नस सन मनन निनन गत तितान तनमन को वन्दन किया है उस वाचकपरम्परा को गर्थातु अनुशेगवर्रों वो पद्ठावजी को हम “द्वितीय स्थविरावली” मानते हैं उक्त दोनो स्थविरावलियाँ सूतीक्त होने से हम इन्हे 'सौत्र स्थविरावलियाँ” कहते है मौत्रस्थ विराचलियों का मिरू्पण करने के अ्नन्तर बीच में दिगम्बर सप्रदाग्र के सक्षिप्त स्वरूप का भी दिग्दर्शन कराया है। “चन्द्रकुल” की उत्तत्ति के वाद जो श्राचार्य- परम्परा चली हैं उसमे, कही कही मतभेद भी दृष्टिगोचर होते हैं, फिर भी उसकी मौलिकता में वास्तविक शब्नच्तर नहीं पड़ता इसी परम्परा को “तुपागच्छ” ने अपनी मूल परम्परा माना है और यह मान्यता ठीक भी है।

तपागच्छीय पट्टावलियो के भ्रन्त मे “प्रकीर्णक पट्टावलिया” दी हूँ, जिनमे अधिकाश “तपागच्छ की शाखा पट्टावलिया” है, और कुछ स्वतंत् गच्छो की पूर्ण, श्रपूर्ण पट्टावलिया भो हैं जो जिस हालत में मिली उसे उसो हालत मे ले लिया है

“खरतरगच्छ” के अधिकाश लेखक “श्रीवद्ध मानसूरि” से झ्पनी पट्टा- वलियाँ शुरु करते हैं। कई लेखको ने प्रारभ से श्र्थात्‌ सुधर्मा से भी पट्टा- वलिया लिखी है, परन्तु उसमें वे सफल नही हुए श्रनेक छोटी बडी गुर्वा-

वलियो पझोर प्रवन्धों मे श्रपती परम्पराएँ लिखी हैं, परन्तु उनमे मौलिकता की मात्रा कम है

प्रत्थ के अन्त में दो ऐसे गच्छो की पट्टावलिया दी हैँ जो गच्छ गृहस्थ व्यक्तियों से प्रचलित हुए थे इन दो गच्छो मे, पहला है “लौंका गच्छ” जो “लक्खा” नामक पुस्तक-लेखक से चला था, जो आजकल “लौकागच्छ” के नाम से प्रसिद्ध है। दूसरा "गृहस्थगच्छ” “कड़ुप्रा-मत गच्छ” इस नाम से प्रसिद्ध है, इस गच्छ का नेता गृहस्थ होता है श्लौर “शाहजी”

कहलाता है इस के खड॒हर /थराद” मे श्राज भी विद्यमान हैं

फत्प - स्थविरावत्री

उपोद्घात 5:

“कल्प” शब्द यहाँ दशाश्रुतस्कन्धान्तगंत “पर्यूषणा कल्प” समझना चाहिए यद्यपि पर्युषणाकल्प दशाश्रुतस्कन्धका एक शअ्रध्याय है, तथापि जेत सम्प्रदाय मे प्रस्तुत कल्प का प्रचार अधिक होने के कारण दशाश्रुत-स्कन्ध की स्थविरावली लिखकर हमने इसे “कल्पस्थविरावली” लिखना ठोक समभा है

“कल्पस्थविरावली” श्रायं यशोभद्र तक एक ही है, परन्तु आर्य॑ यशोभद्र के आगे इसकी दो धाराएँ हो गई हैं। एक सक्षिप्त और दूसरी विस्तृत सक्षिप्त स्थविरावली में मूल परम्परा के स्थविरो का सुख्यतया निर्देश किया गया है। तब विस्तृत स्थविरावली मे पट्टधर स्थविरो के श्रतिरिक्त उनके गुरुआ्राता स्थविरों की नामावलियो, उनसे निक्रलने वाले गण शौर गरों के कुल तथा शाखाओ का भी निरूपण किया है।

सक्षिप्त स्थविरावली मे श्रार्ये वत्र के शिष्य चार बताए हैं। उनके नाम “झआारयें नागिल, श्रार्ये पश्मिल, श्रा्य जयत और आर्य तापस” लिखे हैं। तब विस्तृत स्थविरावली में श्रायं वज्न के शिष्य तीन लिखे हैं, जिनके नाम नआ्रारये वच्नपेन, आय पद्म और आये रथ” हैं। इन दो स्थविरावलियो के बीच जो मत-भेद सूचित होता है, उसके सम्बन्ध मे हम यथास्थान विवरण देंगे

“कल्प-स्थविरावली” भी प्रारंभ से भ्ंंतत तक एक ही समय मे लिखी हुई नही है, जिस प्रकार झ्रागम तीन बार व्यवस्थित किये गये थे, उसी प्रकार स्थविरावली भी तीन विभागों में व्यवस्थित की हुई प्रतीत होती है झागमों

[ पट्टावलीबन्पराग

_६] _- -.-+ 7.5 की प्रथम वाचना पाटलिपुत्र में हुईं, उस समय तक समवत्त: यश्योभद्र- स्थविर स्वर्गवासी हो चुके थे, श्र आर्य सभूतविजयजी भीयातो परलोक- वासो हो छुके हो श्रथवा वाद्धेक्य के कारण कही पर बृद्धावास के रूप मे टहरे हुए हो क्याक्ति पाटलिपुत्र के श्रमणसघ ने दृष्टिवाद पढाने के लिए दो बार भद्बाहु के पास श्रमण सघाठक' भेजकर उन्हे दृष्टिवाद पढाने की विनप्ति की यदि उस समय स्थविर सम्यूतविजयजी जीवित होते और हृष्टि- वाद पढ़ाने की स्थिति में हेते तो पाटलीपुत्र का सघ दूसरा सघाटक भ्र- वाहु के पास कभी नही भेजता, क्योकि भद्रवाहु ने प्रथम सघाटक के सामने ही अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी कि “की महाप्राण ध्यान की साधना में लगा हुम्रा हू श्रत. पाटलिपुत्र नहीं सकता”, इस पर भी पाटलिपुत्र का श्रमणसघ दूसरी वार भद्बवाहु के पास सघाठक भेजकर दवाव डालता है। इसका तात्पये यही हो सकता है कि उस समय भद्गवाहु

को छोडकर ग्रन्य कोई भी दृष्ठटिवाई का शअ्रनुयोगधर विद्यमान नही होना चाहिए

ग्रार्य सभुतविजयजी के शिप्य आर्य स्थूलभद्र राजा नन्द के प्रधान मंत्री शक्टाल के बडे पुत्र थे। इन्होने अपने पिता के मरण के बाद तुरत आये समूतविजयजी के पास श्रमणमार्ग स्वीकार किया था श्रौर चोदह पूर्व का अध्ययन श्राये श्रीमद्रवाहुस्वामी के पास किया था इससे भी यही सूचित होता है कि स्थूलभद्र की दीक्षा होने के वाद थोड़े ही वर्षों मे श्राय॑ सभूतविजयडी स्वर्गवास्ती हो गये ये। यहा झार्य श्रीभद्रवाहु स्वामी के स्र्गंवाससमय के सबंध में हमे कुछ स्पष्टीकरण करना पड़ेगा |

प्रसिद्ध आचार्य श्रीहेषचद्ध सूरिजोने श्रीभद्रवाहस्वामी का स्वर्गंवास परिशिष्ट पर्व मे /जिननिर्वाण से १७० वें वर्ष भे होना लिखा है श्ौर इसी

पथनका झावार लेकर डॉ० चापें ण्टियर, हर्मन जेको वि श्र इनके पीछे चलने डाले विद्वाती ने भगवान्‌ महावीर के निर्वाणसमय मे से ६० वर्ष कम करके जिननिर्वाण का समय सूचित किया है परन्तु इसको ठोक मानने पर जन 595 5 में जिस कालगणना के श्रनुसार निर्वाण सवत्‌ श्रोर युगप्रधान स्पविंगवरदियों का मेल मिलाया गया है, वह सब एक दूसरे से श्रसंगत

प्रथम-परिच्छेद | [

हो जाता है, इसलिए प्रस्तुत कल्पस्थविरावली की परम्परा लिखते के पहले हम ज॑ंतकालगणना पर चार शब्द लिख देना उचित समभते है।

जैन कालगणना पद्धति दो परम्पराश्रो पर चलती है। एक तो युग- प्रधानों के युगप्रघानत्व पर्याव काल के आझ्राधघार पर और दूसरी राजाभ्रो के राजत्वकाल की कड़ियो के श्राधार पर निर्वाण के वाद की दो मूल पर- म्पराओ मे जो अनुयोगधरो की परम्परा चली हैं उसके वर्षों की गणना कर जिननिर्वाण का समय निश्चित किया जाता था| परन्तु जन श्रमण स्थायी एक स्थान पर तो रहते नही थे, पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्विम भारत के सभी प्रदेश उनके विहारक्षेत्र थे। कई बार अनेक कारणों से श्रमणगरा एक दूसरे से बहुत दूर चले जाते थे ओर वर्षो तक उनका मिलता असंभव बन जाता था, ऐसी परिस्थितियों मे जुदे पडे हुए श्रमणगण अ्रपने अनुयोग घर-युगप्रधानों का समय याद रखने मे अ्रसमर्थ हो जाते थे, इसलिए युग- प्रधानत्वकाल-श् खला के साथ भिन्न भिन्न स्थानो के प्रधिद्ध राजाग्रो के राजत्वकाल की शा खला भी अ्रपने स्मरण मे रखते थे। इतनी सतकंता रखते हुए भी कभी कभी सुदृरवर्ती दो श्रमणशासघो के बीच कालगणना- सम्बन्धी कुछ गडबड़ी हो ही जाती थी भगवान्र्‌ महावीर के समय में उनका श्रमण-सघ भारत के उत्तर तथा पूर्व के प्रदेशों में श्रधिकतया विच- रता था। भ्रार्य भद्रबाहु स्वामी के समय तक जन श्रमणो का विहारक्षेत्र यही था, परन्तु मौयंकालोन भयकर दुप्कालो के कारण श्रमण-सघ पूर्व से परिचिम की तरफ मुडा और मध्य भारत के प्रदेशों ठक फल गया, इसी प्रकार सेकड़ो वर्षों के वाद भारत के उत्तर-पदिचमीय भागो में दुष्काल ते दीघंकाल तक अपना अड्डा जमाए रकखा परिणाम स्वरूप जैन श्रमरणा- सध की दो टहुकड़ियां वन गईं एक टुकडो सुदूर दक्षिण की तरफ पहुँची भोर वही विचरने लगी, तत्र दूसरी टुकडी जो अधिक दृद्ध श्रुवधरो की बनी हुई थी, भारत के मध्य प्रदेश मे रहकर विषम समय व्यतीत करती रही विषम समय व्यतीत होने के वाद मध्यमारत तथा उत्तर भारत के भागो में विचरते हुए श्रमण “मथुरा” मे सम्मिलित हुए। थोडे वर्षो के बाद दाक्षि- णात्य प्रदेश में घूमने वाले श्रमण भी परचम भारत की तरफ मुडे और

8 मशिशशिनिरिशिशिलि लिन लि की कक [ पट्टावली-परार _ा ----_-+_-_++7 'सौराष्ट्र' के बेख्द्र नगर “बलभी” में एकत्र हुए। मंडरा तथा हर सम्मिलित होने वालो हुकड़ियों के नेता क्रमशः “स्कन्दिलाचार्या आद “तागार्जव वाचक' थे। दुष्काल के प्रभाव से श्रमणों का पठत-पाठन तो बन्द हो ही गया था, परन्तु पूर्व पढित श्रुत भी धीरे धीरे विस्मृत हो चला था संघो के नेता दोनो श्रुतघरों ने कुछ समय तक ठहर कर विस्मृतप्रायः प्रागमो को लिपिदद्ध करवाया किसी को कोई श्रध्ययनादि याद था, तो किसी को कोई, उन सब को पूछ पूछ कर और श्र,/तबरो को अपनी स्पृतियों के श्राार से म्रागम लिखवाए गए और उन्तके श्राधार से श्रमणो का

पठन-पाठन फिर प्रार॒म हुआ यह समय लगभग विक्रम को चतुर्थ शत्ताव्दी में पडता था |

मधुरा मे जो ग्रागम लिखवाये और पढाएं गए उसका नाम “माथुरी- वाचना” और वलभी मे जो लिंखाए पढाएं गए उसका धाम “वालभी- वाचता” प्रसिद्ध हुआ, इस प्रकार की दोतो वाचनाग्रों के अनुयायी देश मे विद्दा “-चर्या के क्रम से विचरते हुए लगभग दो सौ वर्षों के भीतर फिर “चलभी नगरी” में सम्मिलित हुए। इस समय “माथुरी वाचता के अनु- यायी श्रमण संघ के नेता “श्रीदेवद्धियरिणि”ए और “वालमी वाचता” के श्रमणसघ के प्रधान “कालकाचार्य थे, दूरवर्ती स्थानों मे स्मृतियों के श्राधार पर लिखे गये आगमों मे कई स्थानों पर पाठान्तर श्रौर विषयान्तर के पाठ थे। उन सदका समन्वय करने में पर्याप् समय लगा। इस पर भी कोई स्थल ऐसे थे कि जिनकी सच्चाई पर दोनो सघ निरशक थे, ऐसे विषयो पर समभोता होना कठिन जानकर दोनों ने एक दूसरे के पाठों को बसा का वैसा स्वीकार किया इसके परिणाम स्वरूप कल्पान्तर्गत श्रमण भगवान्‌ मद्दावीर के जीवन-चरित के अन्त मे तत्कालीन समय का निर्देश दो प्रकार से हुप्रा है। “माथुरी वाचना” के अनुवायियो का कथन था कि वर्तमान रर्प ६८० वां है। तब वालध्य सघ की गराना से वही वर्ष ६६३ वां प्रात था, इन १३ वर्षो के अन्तर का मुख्य कारण एक दूसरे से दरवतित्व पा। उत्तरीय सघ ने जिन बुग्प्रधातो का समय गरिनकर ६५० था बर्षे निशक्षत किया था उसमे दाक्षिणात्य सघ ने एक युग रे युगप्रधाव १५ वर्ष के

प्रथम-परिच्छेद ] [

पर्यायवाला अधिक माना और एक युगप्रधान के युगप्रधानत्व के ४१ वर्षों के स्थान पर ३६ श्र ही माने इस प्रकार उन्होने श्रपनी गणना मे १३ दर्षे बढ़ा दिये थे जिसका माथुरी वाचना के अनुयायियो को पता तक नही था, दाक्षियात्य सघ दूर निकलने के बाद केवल युगप्रधानत्व काल की ही गणना करता रहा, तब उत्तरीय सघ युगप्रधानत्व के साथ राजत्वकाल का भी परिगणन करता रहा इस कारण वह अ्रपती गणना को प्रामारिक्र मतवाने का आग्रही था, परन्तु दूसरी पार्टी ने अपनी गणना को गलत मानते से साफ इन्कार कर दिया फलस्वरूप कालनिर्देश विपयक दोनो की मान्यता के _ सूचन मूल सूत्र भे करने पडे | माथुरी वाचना को प्रथम से ही मुख्यता दे दी थी इसलिए प्रथम “माथुरी वाचना” का मन्तव्य सूचित किया गया श्रौर बाद में वालभी वाचना का

कल्प-स्थ तिरावली में आये यशोभद्र तक की स्थविराव्रली पाटलीपुत्र मे होने वाली वाचना के पहले वी है, तब उप्तके बाद की साक्षप्त तथा विस्तृत दोनो स्थविरावलियां, जिनकी समाप्ति क्रमश. “श्रार्य तापस” श्रौर “आये फल्पुमित्र” तक जाकर होती है, ये दोनो स्थविरावलिया दूसरी वाचना के समय यशोभद्रसूरि पयंन्त बी मूलस्थविरावली के साथ जोड़ी गईं थी, और आये तापस तथा आय॑ फल्युमित्र के बाद की स्थविरो की नामा- वली श्राचार्य श्री देवडद्धिगरि क्षमाश्रमण के समय में होने वाले भागमलेखन के समय पूर्वोक्त सन्धित पट्टावली के अ्रन्त मे जोड़ दी गई हैं

पहली वाचना हुईं तब भूतकालीन स्थविरो की नामावली सूत्र के साथ जोड़ी गई। दूसरी वाचना के प्रसग॒ पर उसके पूर्ववर्ती स्थविरों की नामावली पूर्वे के साथ भ्रनुसन्धित कर दी गई, श्र देवद्धिगरि क्षमाश्रमण के समय में द्वितीय वाचना के परवर्ती स्थविरों की नामावली यथाक्रम व्यवस्थित करके ग्रन्तिम वाचना के समय पूर्वतव स्थविरावली के साथ जोड़ दी गई है

कु्च गया झीर शासाए

फल्प-स्थविरावली में कुल, गण श्रोर शाखाएं निकलने का वर्णन प्राया करता है, परस्तु इन नामों का पारिभाषिक श्र क्या है भौर इन नामों के प्रचलित होने के कारण क्या द्वोगे, इन बातो को समभने वाले पाठक बहुत कम होगे भगवान्‌ महावीर के समय में भी नव गए थे, परन्तु उन गणो के साथ कुल तथा शाखाओं की चर्चा नहीं थी भगवात् महावीर का निर्वाण होने के बाद भो लगभग २०० बैर्षो तक सेकडो की सख्या मे जैन श्रमण विचरते थे भौर उनका अनुशासन करने वाले ब्ाचार्य भी थे तथापि उस समय कुल, गण भ्रादि की चर्चा क्यो नहीं, यह शका होना विचारवान्‌ के लिए स्वाभाविक है इसलिए स्थविराचली का प्रारभ

करते के पहले ही हम इन सब बातो का स्पष्टीकरण करना आवश्यक समभते है

भगवान्‌ महावीर के समय में गण” थे, इसीलिए उनके व्यवस्थापक मुख्य शिप्य “गणधर” कहलाते थे। “गण का श्रये यहा एक साथ बैठकर प्रष्ययन करने वाले श्रमणो का समुदाय” होता है। महावीर के गणघर ११ थे परन्तु गण ही माने गये हूँ, क्योकि भ्रन्तिम चार गणधरो के पास श्रमशसमुदाय कम द्वोने के कारण दो दो “गणुवरो” के छात्र-सपुदायों को सम्मिलित करके शास्त्राध्ययन कराया जाता था झत. गणुघर दो दो होने पर भी उनका समुदाय एक एक ही माना जाता था।

भव रही “कुलो” को वात, सो तीर्थद्वूरों के गखधरो मे से एक एक के पास जितने भी श्रमण होते थे वे सब गण॒घर के शिष्य माने जाते थे। ड््स तजिए गणुघरो के समय में कुल नही ये भगवान्‌ महावीर के जितने भी गणपर थ॑ वे सब भ्रपने शिप्पो को निर्वाण के समय से दीघेजीवी गणघर

प्रथम-परिच्छेद ] [ ११

सुधर्मा को सौप जाते थे, शोर बाद में वे सब सुघर्मा के शिष्य माने जाते थे। गणधरों के सम्बन्ध में ही नही, यह परिपाटी लगभग भद्गत्राहु स्वामी के समय तक चलती रही किसी के भी उपदेश से प्रतित्रोष पाकर दीक्षा लो, पर उसे शिष्य तो मुख्य पट्टधर भाचाये॑ का हो होना पड़ता था

झाचाये भद्रबाहु के शिष्य स्वविर “गोदाप्त' से सर्वप्रथम उनके नाम से गोदास गण! निकला इसका कारण यह था कि तब तक जैन श्रमणों को सख्या पर्याप्त बढ़ चुकी थी और सब श्रमणो को वे सम्हाल नही सकते थे इसलिए अपने समुदाय के भ्रमुक साधुओ की वे स्वयं व्यवस्था करते थे, तब उनसे भ्रतिरिक्त जो सेकड़ो साधु थे उनकी देखभाल तथा पठन-पाठन की व्यवस्था भद्गबाहु के श्रन्य तीव स्थविर करते थे जिनके नाम प्ररित- दत्त, यज्ञदत्त श्रोर सोमदत्त थे ये सभी स्थविर काएयप गोन्रीय थे। जो समुदाय 'स्थविर मोदास' की देखभाल में था उसका नाम “गोदास गण” हो गया, उसकी चार शाखाएँ थी, ताम्रलिप्तिका, कोटिवर्षीया, पौण्ड्वर्ध- नीया और दासीकपंटिका

शाखाओं के नाम बहुधा श्रमणो के अभ्रधिक विहार श्रथवा झ्रधिक निवास के कारण नगर भथवा गांवो के नामो से प्रचलित हो जाते थे, ज॑से ताम्रलिप्ति नगरी से तामप्नलिप्षिका, पुण्ड्वर्धव नगर से पौण्ड्वर्घधनिका, फोटिवर्ष नगर से कोटिवर्षीया, दासीकर्पट नामक स्थान से दासीकपटिका झ्ायें गोदास के समय में श्रमणो की सख्यावृद्धि के कारण गण पृथक निकला, शाखाएँ प्रसिद्ध हुईं परन्तु कुल उत्पन्न नही हुआ, क्योकि तब तक मुख्य आचाये के अतिरिक्त किसी भी स्थविर ने अपने नाम से श्िष्प बनाते फा प्रारंभ नही किया था, परन्तु मौयकाल मे श्रमणो को अत्यधिक वृद्धि झौर दूर दूर प्रदेशों मे विहार प्रचलित हो चुका था, परिणाम यह हुआ कि पट्टधर के श्रतिरिक्त अन्य योग्य स्थविर भी श्रपने नाम से पुरुषों को दीक्षा देकर उनके समुदाय को अपने “कुल के नाम से प्रसिद्ध करने लगे श्र उसकी व्याख्या निश्चित हुई, कि “कुल एकाचारयेसन्तति:” जब॒ तक साधु- सख्या भ्रत्यधिक बढ़ी नही थी, तब तक आचाये की श्राज्ञा मे रहने वाले साधुसमुदाय गण के नाम से ही पहिचाने जाते थे। परन्तु श्राचा्य के ग्रुरु-

] [ पट्टावली-पराग २२

है... टिक लि लक कक जी वी लक जि 3

भाई श्रथवा तो उनके शिष्यों ने अपने श्रपने नाम से शिप्य ६30 अपने ताम से “कुल” प्रसिद्ध किये तव आचार्यों को 'कु्ला तथा 'गणों' के सम्बन्ध से नये नियम निर्माण करने पड़े

॥/एत्य कुल विग्येवं, एपायरियस्स संतती जाए तिण्ह कुलाणमिहों पुणा, साविद्खाण गणो होइ ४”

भ्र्थात्‌ : एक आचार्य का जिष्यपरिवार 'कुल” कहलाता है, ऐसे परस्पर सापेक्ष याने-एक दूसरे से सभी प्रकार के साम्भोगिक्र व्यवहार रखने वाले तीन कुलो का समुदाय “गण” कहलाता है।

ऊपर की गाथा मे “कुल तथा “गण” की सूचना की है; शास्त्रों मे कुल की परिभाषा यह बाघी गयी है कि “ग्राठ साघधुग्रो के ऊपर नवमा उनका गुह स्वविर हो, तभी उसका नाम “कुल कहलाता था, आ्राठ में एक भी सख्या कम होने पर वह कुल कहलाने का अधिकारी नही होता था | यह कुल की कम से कम सख्या मानी गयी उससे अधिक कितनी भी हो सकती थी, परन्तु इस प्रकार के कम से कम तीन 'कुल!' सम्मिलित होते, तभी भपने सघटन को 'गण' कह सकते थे जिस प्रकार एक कुल मे श्रमणों का होता श्रावश्यक माना गया था, उसी प्रकार एक गण से “अटटाईस श८ साधु सम्मिलित होते,” तीन कुलो के २७ और २८ वां “गशणास्थविर” तभी वहू संघटन “गरणु” नाम से झपना व्यवहार कर सकता था, और गण को जो जो अ्रधिकार प्राप्त थे वे उसको मिलते थे इस प्रकार “कुल” तथा “गण” की व्याख्या शास्त्रकारो ने बाँधी है, जब तक

युगप्रधात शासन- पद्धति” चलती रही तब तक इसी प्रकार की कुल तथा “गण” की परि-

भाषा थी, सघ स्थविर-शासन पद्धति विच्छेद होने के बाद कुल, गण की परिभाषाएँ भी धीरे घीरे भुलायी जाने लगी और परिणामस्वरूप गरण' शब्द का स्थान “गंच्छ ने ग्रहण किया वास्तव मे गचुछ शब्द प्राचीन काल में "राशि के अथे मे प्रयुक्त होता था। दो साधुओ की सम्मिलित सझ्या 'सघाटक' कहलाती थी, तब तीन, चार, पांच आदि से लेकर हजारो तक की सम्मिलित सख्या “गच्छ' नाम से व्यवहृत होती थी 'गच्छ' शब्द का

प्रयम-परिच्छेद ] [ १३

व्यावहारिक अर्थ हम 'टुकडो' कर सकते हैं, “वृहतकल्पभाष्य” में तोन से लेकर ३२ हजार तक की श्रमणसख्या को 'गच्छ' के नाम से निर्दिष्ट किया है। धीरे धीरे गण" शब्द व्यवहार में से हटता गया श्रौर उसका स्थान गच्छ' शब्द ने ग्रहण किया, परन्तु वास्तव में गण का प्रतिनिधि “गच्छ' नही है गण मे जो आचःये, उपाध्याय, गणी, स्थविर, प्रवततंक और गरणा- वच्छेदक प्रमुख अ्रधिकारी माने गये हैं, वे गच्छ मे नही माने, क्योकि गच्छ छव्द का श्रथ ही साधुप्रो की टुकड़ी माना गया है झोर सूत्रकाल मे तो गच्छ के स्थान पर “गुच्छ” छाब्द ही प्रयुक्त होता था। परत्तु भाष्यकारो ने “गुच्छ” को “गच्छ' बना दिया, स्थविर-शासन-पद्धति उठ जाने के वाद “कुल” गण शब्द बेकार बने भोर “गच्छ” शब्द ने 'गण' शब्द के स्थान मे भ्रपनी सत्ता जमा ली। यही कारण है कि पिछले सूत्र-टीकाकारों को “गच्छाना समूह: कुल” यह व्याख्या करनी पड़ी स्थविर-शासन-पद्धति बद पडने के बाद 'कुल' तथा 'गणों' के 'आ्राभवदु व्यवहार” 'प्रायश्वित्त व्यवहार' झादि सभी प्रकार के व्यवहार भ्रनियमित हो गये थे, सभी सप्तुदायों के पास झपने अपने कुल, गण; के नाम रह गए थे, उनका उपयोग प्रन्नज्या के समय प्रथवा तो महापरिठावश्िया के समय में “दिकृश्रावण' मे होता था श्रोर होता है।

ऊयर हम लिख आये हैं कि 'सापेक्ष तीन कुनों का एक गण बनता था इसका तात्पर्य यह है, कुल में साधु सढ्या कितनी भी अधिक क्यों हो. तीन कुलो से कम दो अथवा एक कुल 'गण' का नाम नही पा सकता था। तीन अश्रथवा उससे कितने भी भ्रधिक कुल एक गश में हो सकते थे, परन्तु तीन से कम कुल गरा में नही होते थे 'एत्थ कुल विण्णेय” यह उप- युक्त गाथा कल्पसूत्र की अ्रनेक टीकाग्नो मे उद्धृत की हुई दृष्टिगोचर होती है 'कल्पसुबोधिका' मे भी जब वह पहले छपी थी उपर्युक्त गाथा शुद्ध रूप में छपी थी, परन्तु बाद की श्रावृत्तियों में संपादको की अ्रनभिज्ञता से भ्रथवा एक दूसरे के अनुकरण से यह गाथा अशुद्ध हो गयी है 'तिण्ह कुलाण मिहो पुण' इस चरण में “तिण्ह” के स्थान में “दुण्ह” हो यया है जो अशुद्ध है, सर्वप्रथम “कल्पकिरणावली” में “दुण्ह कुलाण मेहोपुण” यह शशुद्ध पाठ

है... पिलिललि लशिलम कल अेस ] [ पट्टावली-परुग

छपा, कल्पकिरणावली के वाद छपपने वाली अनेक कल्पटीकाश्ों में “दुण्ड कलाणमिहो” यह अशुद्ध रूप छपा है जो परिमाजनीय है

१. मूल कल्पस्थविरवली सानुदाद :

मु० + “तिरां कालेणं तेणं समएरं समरणसस्‍्स भरावसो महावीरस्स नव गणा इक्कारस गझहरा होत्था 0२०१ एं!

ग्रथ॑ ; उस काल भौर उस समय में श्रमण सगवन्त महावीर के गण भर ११ गणुघर हुए

“से केराड्र ख॒ भते ! एवं दुच्चई-समरास्स भगवश्नो महावीरस्स तव गणा इक्कारस गणहर होत्या ? समरएस्‍्स भगवश्नो महावी रस्स जेहू इंदभूई पझरणमारे गोयसे गोत्तेणं पंचसमणसयाईं वातेइ, सज्मिसे अणगारे पग्गिभुई नामेणं गोयमे गोक्तेरं पंचसमणसयाई धाएड, फणीयसे श्रस्यगारे पामेरं वाउभुई गोयमे गोत्तेण पचरसमसासयाइ वाएड, थेरे श्रज्जबियत्ते भारदाये गोस्तेण पंचसमणसयाइ वाएइड, येरे अ्रज्जसुहम्भे भ्ग्गिवेसायरों गोत्तेणं पंचसमणासयाई बाएड, येरे मंडियपुत्ते वासिट्ठ गोत्तेरं भ्रदृषुद्दाईं समएसयादह वाएइ, येरे सोरियपु्ते कासवे गोत्तेणं अ्रदृषुद्वाई समणस्याई वाएड, बेरे प्रकपिए गोयमे गोत्तेयं, येरे श्रयलभाया हारियायणे गोत्तेश एे दुष्नि थेरा तिन्नि तिन्नि-ससछसयाद्द बाइ ति, थेरे मेयज्जे येरे क्रज्जप- भासे एए दोच्िवि थेरा फोडिज्ना गोत्तेण तिन्नि तिज्लि समणसयाइ' वाएंति, से एतेरां प्र रा प्रज्जो एवं वुच्चई-समशस्स भगवश्नो महावीरस्स बद गणा, एक्वारस गणहरा होत्या 0२०२४

भगवान्‌ महावीर के £ गण और ११ गणधघर होने की बात सुनकर शिष्य गुरु से पूछता है 'भगवन्‌ ! ऐसा किस कारण से कहा जाता है कि भगवान्‌ महावीर के नव गण थे और ग्यारह गण॒वर ? प्रश्न का उत्तर देते हुए आचाये कहते हैं : भगवान्‌ महावीर के श्षिष्पय जिनका नाम इन्द्रभूति था भौर जो तीन भाइयो मे वड़े थे तथा गोत्र से गौतम थे ४०० श्रमणो को सूत्रवाचना देते थे। अग्निभूति नामक श्रनगार जो गोत्र

प्रथम-परिच्छेद ] [ १५

से गौतम और मझोले थे, ५०० श्रमणों को प्रागम पढाते ये। कनिष्ठ वायुभूति नामक ग्रोत्र से गौतम थे जो ५०० साथधुभ्रो को वाचना देते थे स्थविर-प्रायंव्यक्त जो गोत्र से भारद्दाज थे और ५०० श्रमणों को वाचना देते थे, स्थविर प्रार्य सुधर्मा जो गोत्र से पग्निवेश्यायन थे और ५०० श्रमणो को वात्रना देते थे, स्थविर मडिकपुत्र जो गोत्र से वासिप्ठ थे और साढ़े तीन सौ श्रमणो को वाचना देते थे, स्थविर मौय्श्रंपुत्र जो गोत्र से काइयप थे साढे तीन सौ श्रमणो को वाचना देते थे, स्थविर अकमिपत गोत्र से गौतम, स्थविर अ्रचलभ्राता गोत से हारितायन, ये दोनों स्थविर त्तीन-तीन सौ श्रमणो को सम्मिलित रूप से वाचना देते थे स्थविर मेदाय॑ ओर स्थविर प्रभास ये दोनों स्थविर गोत्र से कौण्डिन्य थे, और प्पने तीन- तोन सौ श्रमणो को एकत्र वाचना देते थे। इस कारण से है श्रार्य॑ ! यह कहा जाता है कि श्रमण भगवन्त महावीर के & गण शौर ११ गणघर थे

स्पष्टीकरण :

आठवे तथा नतभे गणधरो के तीन-तीन सौ शिष्य थे परन्तु उनकी वाचना एक ही साथ होती थी अन्रतः एक गण कहलाता था, इसी प्रकार दक्मवें तथा ग्यारहवें गणधरों के भो तीन-तोन सौ श्रमण शिष्य थे, पर्तु वे ६००-६०० श्रमण सम्मिलित बाचना लेते थे, इसलिये “एकव चनिको गणाः” इस नियमानुसार पिछले गणधरो के ही गण माने गए हैं परिणामस्वरूप & गण झौर ११ गणबर बताए है

“जे इसे श्रज्जत्ताते सनणा निःगथा विहरंति एए सं सब्बे अज्ज- सुहम्मस्स अश्ररगारस्स श्राह्मवच्चिज्जा, अवमेसा गशणहुरा तिरवच्चा चोच्छिन्ा 8२०४४

“सब्बे एए समणासस्‍्स भगवश्नो महावीरत्स एछ्वारस वि गराहरा इवालसगिणो चोहसपुव्विरें समत्तमणिपिडयधरा रायगिहे नगरे मांस- एस भत्तेसं अपाणएणं कालगया जाव सष्डदुक्खप्पहीणा | थेरे इंदभूई, थेरे भज्ज्सुहस्मे, [सद्धि गए महावोरे पच्छा दोज्षिवि परिनिब्बुया २०४४

| [ पट्टावली-पराग

१६

कक शा का 4 हर हे द्ठा हम [ 5 खतुददंश पूर्वी सम्पूर्ण गणिपिटक के धारक राजगृह तगर छा हि मासिक भोजन-पानी का त्याग कर निर्वाणप्राप्त हुए, सवदु.ख हि हे इनमें स्थविर इन्द्रभूति श्रौर स्थविर आर्यसुधर्मा ये दो स्थविर मह दा निर्वाण के वाद निर्बाण प्राप्त हुए थे !! श्र्थात्‌ शैप नो गणवर मह की विद्यमानता मे ही मोक्ष प्राप्त हो चुके थे २०३॥

जो ये आजकल श्रमण निग्नेन्‍्थ विचर रहे है वे 8 पा ही के सन्‍्तानीय कहलाते है, अ्रवशेष गणधरों की परम्परा विच्छिन्न हो छु है २०४।१

“समरे भगव सहायोरे कासवे गोत्तेरं

समणसस्‍्स रण भगवश्नो महावीरस्स कासवगोत्तस्स अज्जसुहम्मे भेरे अ्ंतेवासी अ्ग्निवेसायरासगोत्ते

थेरस्स णं अज्जसुहम्मस्स अग्पिवेसायणसगोत्तस्स अ्रज्ज जंबू नासे थेरे अतेवासी कासउगोत्ते

येरस्स रं अज्जजंबुनामस्स कासवगोत्तस्स भ्रज्जपभवे थेरे प्रंतेवासतो कच्चायरसगोत्ते

थेरस्स रं प्रज्जप्पभस्स कच्चायणशसयोत्तस्स प्रज्जसेज्जंभवे थेरे प्रतेवासी सणगरषिया वच्छुसगोत्ते

थेरस्स खां अ्रज्जसेज्जंभवस्स मणगपिउठणो बच्छसगोत्तस्स अज्जजस- भद्दे थेरे श्तेवासी तुँगीयायणसगोत्ते ७२०५७

अ्मण भगवान्‌ महावीर काश्यप-गोत्रीय थे, काइमप-गोत्रीय श्रमण भंगवात्‌ महावीर के शिष्य भ्रग्तिवेश्यायन सम्रोन्न आर्ये-सुघर्मा हुए, वेश्यायन सगोत्र आयं-सुधर्मा स्थविर के शिष्य काश्यप

हुए, काश्यप गोत्रोय स्थविर श्ार्य जम्बू के शिष्य कात्य

त्यायन सग्रोच्र श्रा्ये प्रभव हुए, कात्यायन गोत्रीय स्थविर आर्य प्रभव के शिष्य वत्स-सगोत्रीय

स्थविर शभ्रार्य शब्यम्मव हुए, जो मनक मुत्रि के पिता थे, बत्ससग्रोत्र भौर

अरित- गोन्रीय आये जम्बू

प्रथम-परिच्छेद | [ १७

मनक पिता स्थविर आये गग्यम्भव के शिष्य तुगियायनसगोतन्र श्राय॑ यशोभद्र हुए ।२०५

“इसके झ्रागे स्थविरावली दो प्रकार की देखने में श्राती है ' एक संक्षिप्त श्रौर दूसरी विस्तृत, पहले सक्षिप्त स्थविरावली दी जा रही है :

“संखित्ततायणाए श्रज्जजसभद्वाओ भ्रग्गभो एवं थेरावली भरिणया त॑ जहा-येरस्स र॒पं अ्रज्जजसभहस्स तुंगियायणसमगोत्तस्स अ्रंतेवासी दुबे थेरा- थेरे प्रज्जसंभूयविजए माढ्रसगोत्ते, थेरे श्रज्जभहृबाह पाईशसगोत्ते, थेरस्स णं झज्जसंभूयविजयपस्स माहरसगोत्तस्स अंतेयासी श्रज्जथूलभहे थेरे गोयम- सगोत्ते, भेरस्स रं कज्जयूलभहस्स गोयमसगोत्तस्स अ्रतेवासी-दुबे थेरा-थेरे प्रज्जमहागिरी, एलावच्छसगोत्ते, थेरे भ्रज्जसुहत्थी वासिट्ठुसगोत्ते, थेरस्स रां अ्रज्जसुहत्यिस्स वासिट्टसगोत्तस्स अंतेवासी दुवे थेरा-सुट्टिय-सुप डिबुद्धा कोडि- यकाकंदगा-फरघावच्चसगोत्ता थेराणां सुद्टिय-सुपर्डिबुद्धाणं कोडिय-काकद- गाणं वग्घावष्चसगोत्ताण श्रतेवासी थेरे श्रज्जड् ददिशल्न कोसियगोत्ते हट

संक्षिप्त वाचना से आये यशोभद्र के भ्रागे की स्थविरावली इस प्रकार कहो है. यथा तुगियायणसतग्रोत्र स्थविर यश्योभद्र के दो स्थविर शिष्य थे: माठरसगोत्रीय स्थविर सभूतविजय और प्राचीन-सग्रोत्र स्थविर भद्र- बाहु, स्थविर श्राय॑ सभूतविजय के स्थविर शिष्य गोतलम सगोत्न भ्रार्य स्थुल- भद्र हुए, स्थविर स्थुलभद्र के स्थविर शिष्य दो हुए, स्थविर एलावत्स- सगोन्नीय झार्य महागिरि और वासिष्टसगोत्र श्रा्य घृहस्ती स्थविर सुहस्ती के स्थविर शिष्य दो हुए ! स्थविर सुस्थित श्रोर सुप्रतिवुद्ध, गृहस्थाश्रम में सुस्थित स्थविर कोटिवर्प नगर के निवासी होने से कोटिक कहलाते थे श्रौर सुप्रतिवुद्ध गृहस्थाश्रम में काकन्दीनगरी निवासी होने से काकन्दक नाम से प्रसिद्ध हुए थे ये दोनो स्थविर व्याप्लापत्यसगोत्र थे, इन दोनो स्थविरो के स्थविर शिष्य कौशिकगोत्रीय “इन्द्रदिन्न' थे ।'

“थेरस्स रं भअज्जइंददिल्लस्स कोसियगोत्तस्स अतेवासी थेरे प्रज्जदिश्ल गोयमसगोत्ते, थेरस्स रं अ्रज्जदिन्वस्स गोयमसगोत्तस्स श्रंतेवासी थेरे अश्रज्ज- सीहगिरी जाइस्सरे कोसियगोत्ते, थेरस्स रपं प्ज्नपिहगिरिस्स जातिसरस्स

पैंसियमोत्तस्स अतेवासी थेरे शा घबड़रे गे मससगोसे थेरत्ल से सज्जवइ- रस्स गोयमसमोत्तस्स अतेवासी ८त्तारि थेरा-णेरे प्रज्जनाइले, थेरे श्रज्जपो- पिच, थेरे प्रज्जजयते, थेरे श्रज्जतावने थेराओ अज्जवाइलाओ अज्ज- नाइला साहा निम्पया, शेरात्रो अज्जपेमिलाओं अज्जपोसिला साहा विग्गया, यरा्रो श्रज्जजयताशो ऋष्जजयती साहः निग्गया, थेराग श्ररुजतावस/भ्रा श्रज्जतावसी साहा मिग्गया ईत ४२०४

कौशिक गोत्रीय स्थविर श्रार्य इन्द्रदिन्न के गिप्य स्थविर गौतम सगोत्र ब्राय॑ दिल्ल हुए, आय दिल्न के स्थविर शिष्य आर्य सिंह॒गिरि कौणिक गोत्रीय हुए, जिनको जाति-स्मरण ज्ञान था। स्थविर आये सिहगिरि के स्थविर भिष्प आये वच्चध गोतमग्रोत्नीय हुए, स्थविर श्र।य॑ वच्च्र के स्थविर शिय्य चार थे : स्थबिर श्रार्य नागमिल, स्थविर श्रार्य पद्मिल, स्थविर यार्य जयन्त और स्थविर प्राये तापस स्थविर आर्य नागिल से आार्यवागिना शाखा निकली, स्थविर आर्य पदह्मिल से श्रार्यपक्मिला शाखा निकली,

स्थविर आये जयन्त से श्रायंजयन्ती शाखा निकली श्र स्थविर प्रार्य तापस से झ्ार्यतापसी शाखा निकली २०६ *

“पित्यरवायणाए पुरा/ झ्रज्जजसभद्वञ्नो परश्नो थेरावली एवं पलोइ- ज्जई, तजहा-घेरस्स रा श्लज्जजसभहस्स इसे दो घेरा अ्रतेवासी अहावच्चा अ्भिज्ञाया होत्वा तंजहा-धेरे श्रज्ञभद्दवाहु पाईशसगरोले, थेरे अज्जसभूय - विजये माढरसगरोत्ते थेरह्स रं अ्रज्ञभट्दवाहुस्स पाईससगोत्तस्स इसे चत्तारि घेश श्रतेवासी पश्रह्मच्चा श्रभिण्णाया होत्या, त० थेरे गोदासे, थरे भ्रग्गिदत्ते, थेरे जण्यदत्े, थेरे सोझ्ददसे कासवेगोत्तेर थेरेह्ितो सा गोदासेहितो फासवगोत्तेहितो एत्थ झा ग्रोदासगणोे सास गरो तग्गए तस्स रत इसान्नी चर्तार साहाओ एकमाहिज्जति, त॑० तामलिक्तिया, कोडीवरिसिया, पोडवदरशिया, दासीखब्बडिया ॥२० जाए!

'सबिस्तर वाचना के अनुसार आर्य यज्ञोमद्र के भ्रागे स्थविरात्रली इस प्रकार देखी जाती है, जेस आर्य यश्ोनद्र स्थविर के ये दो स्थविर अपत्यसमानत आर प्रस्थात शिष्य हुए, स्थविर अ्रार्ये भद्गवाहु प्राचीन

प्रथम-परिच्छेद ] [ १६

पोत्रीय और सभूततविजय स्थविर माठर गोन्नीय, स्थविर आाय॑ भद्गबाहु के ये चार स्थविर शिष्य हुए, जो निज्रसन्‍्तान तुल्य धौर प्रख्यात थे। उनके ताम स्थविर गोदईस, स्थविर अग्निदत्त, स्थविर यज्ञदत्त श्रौर स्थविर सोमदत्त थे. ये सभी काइयप गोत्रोय थे, स्थविर गोदास से यहा गोदास नामक गण निकलः ! उसकी ये चार शाखाएँ इस प्रकार कही जाती है, जैसे : ताम्रलिप्तिका, कोटिवर्षीया, पौण्ड्वर्धनिका और दासीकपटिका#& ]!५०७॥ ' शेरस णं अज्जसंभूयविजयस्स साढरसगोत्तस्स इमे दुवालसथेरा शतेदर्त अहावच्चा अभिष्णाया होत्या, तंजहा नंदराभद॒दुवनवणाभद्द तह तीसभह जसभहे थेरे सुमशभहे, सरिभहे पुश्नणनहे ४१७ थेरे घूलभटद्ठे, उज्जुछती जबुनासघेज्जे थेरे दीहभट्े, थेरे तह ॒पंड्ुभद्दें 0२४

थेरस्स ण॒श्रज्जसंभुद्वविजयस्स माढरसगमोसस्स इमाओ सत्त प्रंते- वासिणीक्षों श्रह्मवच्चाशत्रो अ्भिन्नाताप्रो होत्था, तंजहा :

जदखा जवखदिन्ञा, भूया तह होइ भूयदिज्ला सेरया, वेणा, रेखा, भगिरणीओ शूलभहस्स ॥१४२०८॥

६8 इनमें पहली शाखा “पताम्रलिप्तिका” की उत्पत्त वग देश की उस समय की राजघानो ताम्नलिपति वा ताम्रलिसिका से थी जो दक्षिण वगल का एफ प्रसिद्ध वर्दरगाह था। आजकल यह स्थान “तमलुक” जिला मेदिनोपुर वगाल मे है दूसरी शाखा “कोटिवर्षोथा”” की उत्पत्ति कोटिवर्ष नगर से थी, यह नगर 'राठ” देश (आजकल का मुशिदाबाद जिला पश्चिमी वंगाल) की राजधानी थी। तीसरी क्लाखा “पौण्डवर्धनिका”” थी जो पुण्ड्वर्घन (उत्तरों वगाल की राजधानी गया के उत्तरी तट स्थित पौण्ड्वर्धन नगर) से उत्पन्न हुई थी पुण्ड्वर्धत को श्राजकल पाण्डुग्रा”” कहते है (किरोजाबाद) मात्दा से मील उत्तर की ओर था। इसमे राजशाही, दीनाजपुर, रगपुर, नदिया, वीरमूम, मिदनायुर, जगलमहल, पचेत श्रौर छुनार सामिल थे। भौर चौथी शाखा पूर्व बंगाल के समुद्र समोपवर्ती “दासीकर्पठट”” नामक स्थान से प्रसिद्ध हुई थी

-प्राग है! िलिलिमिकीनिक दिन, ५2 स्थविर भ्रार्य सपूतविजयजी के ये १२ स्थविर शभिप्य हुए, है! सस्तान-तुल्य प्रसिद्धिप्राप्त थे उनके नाम ये हैं भत्दतभद्ठ, कक तिष्यभद्र, यशोभद्र, स्थविर सुमनोमद्र, मणिभद्र, पूणभद्रक्क, स्थाविर स्वुलभद्र, ऋजुमति, जम्वूनामा, स्थविर दीर्घभद्र तथा स्थविर पाएड्डुमद्र ।र।। स्थविर बार्य सभुतविजबजी की ये सात शिष्याएँ हुई, जो अपत्य- समान प्रसिद्धिप्राप्त थी, उनके नाम ये हैं वयक्षा, यक्षदता, भूता, भूतदत्ता, सेवा, वेता ओर रेणा ये श्ाये स्थुलभद्र की बहने थी ॥२०८॥। "थेरस्स खां श्रज्जयूलभद्दस्स गोयमसगोत्तस्स इमे दो थेरा अहावच्चा प्रसिन्नाया होत्या, तंजहा-थेरे श्रज्जमहागिरी एलावच्छलगोत्ते, थरे सुहत्यी चासिदृसगोत्ते थेरस्स रा श्रज्जमहागिरिस्स एलावच्छुसगोत्तस्स इसमे श्र थेरा श्र तेवासी अहावच्चर अभिन्नाया होत्था तंजहा थरे उत्तरे, थेरे बलिस्सहे, थेरे घणड़े, थेरे सिरिट्ठु, थेरे कोडिन्ने, थेरे नागे, थेरे नागमित्ते, थेरे छड़लुए रोहपुत्ते कोसिए गोत्तोणं थेरेंहितो छडुलुएहितो रोहयुर्ते- हितो-कोसियगो््तेहितो तत्थ णं तेरासिया निग्गया थररेंहितो णं उत्तर- दलिस्सहेहितो तत्य रा उत्तरवनिस्सहुगरो नाम्नं गणे निग्गए, तस्ससरां इमाओ चत्तारि साहाओी एवमाहिज्जंति, तंजहा : कोसबिया, सोत्तिवत्तिया, कोडवारो, चंदवनागरी ॥२०६९४ 'स्थविर ग्राये स्थूलभद्र के ये दो स्थविर शिप्य थे, जो मथापत्य भ्रभ्िज्ात थे ; इनके नाम स्यविर श्रार्य महागिरि एलावत्सगोत्रीय और स्थविर श्रार्य मुहस्ती वामिष्टगोत्रोय, स्थविर आये महागिरि के ये आश्राठ स्थविर शिष्य थे, जो यथापत्य ओर अभिज्ञात ये। उनके नाम ये हैं: स्थविर उत्तर, स्थविर वलिस्सह, स्थविर घनाछ्य, स्थविर श्रीआद्य, स्थविर कौडिन्य, स्थविर नाग, स्थविर नागमित्र, स्थविर पडुलूक रोहगुप्त कोशिक गोत्रीय स्थविर पहुलूक राहगुप्त से च्रराणिक निकले, स्थविर उत्तर और वलिस्सह से उत्तरवलिस्मह नामक गण निकला उसकी ये शाखाएँ चार इस प्रकार कही जाज़ी है जैसे : कौशाम्बिका&8, शुक्तिमतीया, कोडम्वाणी, चन्द्रनागरी र०्हा

& कोयाम्वी तगरी से प्रस्ति्प होने वाली शाखा फ्रोशाग्विका कहलाई कौशावी

च्ब

प्रथेम-परिच्छेददे ]. मिनी शिलशनिशीटिसल [ २१

“थेरस्स रं प्रज्जसुहस्थिस्स वीसिट्सगीत्तत्स इसे दुवालस थेरा ग्रंतेवासी श्रह्मच्चा श्रभिन्नाया होत्यः, तंजहा।

थरेत्य अ्र॒ज्ज॑रोहरा-भहजसे मेहगरणी ये कामसिड्डी सुद्धियसुप्पडिबुद्े, रकिलिय तह रोहगुले ये 0१७

« इसिगुत्ते सिरिगुत्ते, गरी बंसे गणी तह सोसे दस दो थे गर्महरा खलु, एए सोसा सुहत्यिस्स 0२७२१ ०४

'स्थविर आय सुहस्ती के ये १२ स्थविर शिष्य हुए, जो यथापत्य श्रभिज्ञात थे। उनके नाम ये हैं :

स्थविर भ्रार्यरोहण, स्थविर भद्रयशञा, श्रार्य मेघगरि, स्थविर कामद्धि, स्थविर सुस्थित; सुप्रतिबुद्ध, श्रार्य रक्षित और स्थंविर रोहगुप्त १। ऋषियुप्त, श्रीगुप्त, ब्रह्मगरिण तथा सोमगरि, ये १२ गणबघर श्रार्य॑सुहस्ती के शिष्य हुए ॥शारश्णा

“थेरेहितो खा श्रज्जरोहरेहितो कासवर्गुत्तेहितों तत्थ रं उद्देहगरो नासं गणो निग्गए। तस्सिमाओ चत्तारि साहाओ हतिग्गयोश्रो छुच्चकुलाईं एवमाहिज्जंति से कि त॑ साहाओ ? साहाओझ्ो एवसाहिज्जति उद्‌बेरि- ज्ञिया, मासपुरिया, साहुरिज्जिया, पुन्नपत्तिया, से तं साहाओ। से कि त॑ कुलाइं ? कुलाई एकमाहिज्जंति, तंजहां :

के की

इस सभेय 'कोसमग” इस नाम से अधिक प्रसिद्ध है- जहानपुर से दक्षिश १२ मील,

इलाहाबाद से दक्षिरा-पर्दिचम ३१ मील है। पश्मीसा ' नामक पहाडी पर एक स्तम्स और एक मन्दिर है जो -कौसम से तीत भील पश्चिम मे है। शुक्तिमती दक्षिण मालवा की एक प्रसिदृध नगरी थी, उससे प्रसिदव होने वाली शाखा शौक्तिमतीया कहलांई

कौहम्वराण स्थान कहा था इसका पता नही लगा, सभव है यह स्थानि युक्तप्रदेश मे कही होना चाहिये

चन्द्रनंगर सेवडाफुली जंवशन से मील (हावडा से २१ मील) उत्तर चन्द्रनगर का रेलवे स्टेशन है। फ्रासीसियो के भ्रृतयूर्व राज्य मे २२/५१/४० उत्तर अक्षाण पर और ८८/२४/५० 'पूर्व देशाव्तर मे हुयली नदी के दाहिने किनोरे पर चन्द्रनगर एक छोटा मुन्दर शहर है, हुगली के रेलवे स्टेशन से मील दक्षिरं। मे चन्द्रनगर रेल्वे स्टेशन है

है... नि मर सिम 2 [ पद्ठावली-पराग

है. 0 शशि कि निनिम किक

पढस नागभूयं, बीय॑ पुछ सोमभूइय होई ग्रह उल्लगच्छ तइयं, चउत्थय हत्विलिज्ज तु ७१७

पंचमग नदिज्जं, छह. पुरा पारिहासियं होई। त् ॥7 उद्देहग रास्सेते, उच्च कुला होति नायव्या ॥२४२ ६१७

स्थविर आर्य रोहण काश्यपगोन्रीय से छं हगण नामक गण निकला, उसकी ये चार शाखाएँ और कुल तिकले जो ये है -

प्रथम दाखाओं के ताम लिखे जाते है: उदृम्वरीया*", मासपुरिया , माथुरीया३, पूर्णोपत्रिका, ये शाखाए' हैं। अत्र कुल क्या हैं सो कहते है : नागभूत, सोमभूतिक, आाद्रकच्छ, हस्तलेह्य ॥१॥ ४५ नन्‍्दीय, पारिहासिक, उ् हगण के उक्त छ. कुल जानने चाहिए ॥२॥२११॥

“थेरेहितो सिरिगुत्तेहितो एत्थ चारणगरो नाम गरे तिग्गए तस्स खां इमाओ्रो चत्तारि साहाओे सत्त कुलाइ एकमाहिज्जति। से कि साहातो ? साहातो एक्माहिज्जात-तजहा : हारियमालागारो, सकासिया,

गवेधूया, वज्जनागरी, से तं साहाझो से कि कुलाईं ? कुलाइ एवमा- हिज्जति तजहा :

पढसेत्थ वच्छलिज्जं, बीय पुणा पीइधम्पय होड़ तइये पुण्य हालिजब्ज चउत्थग पुसमित्तिज्ज ॥१0

उद॒म्तैया ब्राजजल का डोमरिय्रा गझज समझता चाहिए, यह स्थान शापती नदी के दाहिने किनारे तहसील का सदर मुकाम है। इसके पूर्व मे करव १६-१७ मील पर वासी, पश्चिमोत्तर मे उतने ही फासले पर उत्तरैनी तहसील का सदर मुकाम है इसके पब्चिम मे करीब ४८ मील पर जिले का सदर मुकाम गोडा है। श्रक्षाश २७/१२ रेखाग ८५२/२४/३६ पर डोमरिया गंज ग्रवस्थित है।

'मासयुरीया? वर्त देश की राज्यानी “गासपृए' थी जिससे “मासपुरिया” शाखा जिकली हु

हि रे यह रँि के माउपया! यह शाख्रा मथुरा नगरी से प्रसिदव हुई है, आगरा से मथुरा ३१ मील परश्चसीत्तर मे ऋक्षाश २७३० रेखाश ७७ /४१ पर अवस्थित है।

प्रथम-परिच्छेद | [ २३

पंचरुगं सालिज्जं, छट्ट पुण अ्रज्जचेडयं होई सत्तमगं कण्हसहूं, सत्तकुला चारणगरास्स ॥२॥२१२७

स्थविर श्रीग्रुप्त हारितगोत्रीय से यहा चारणगण नामक गण निकला, उसकी ये चार शाखाएँ श्लौर सात कुल इस प्रकार कहे जाते हैं . प्रथम : १. वत्सलीय, २. प्रीतिधर्मक, ३. हालीय, ४. पुष्यमित्रीय, मालीय, ६. झ्ार्य चेटक और ७. सातवा कृष्णसख ये चारण गण के कुलो के नाम हैं २१२।

धथेरेहितो भद्दजसेहितो भारहायसगोत्तेहितो एत्थ णं उड्भधवाडियगरो नि्गए। तस्स रा इसाओ चत्तारि साहाओ्रो, तिन्ति कुलाईं एवमाहिज्जंति से कि तं साहाश्रो ? साहाओ एचमाहिज्जंति तं० : चंपिज्जिया, भद्दिज्जिया, काकंदिया, मेहिलिज्जिया, से त॑ साहाश्ो। से कि त॑ कुलाइ ? कुलाईं एवसाहिज्जंति : भदजसियं तह भद्द-मुत्तियं-तइयं होइ जसभहं। एयाइ उद्धवाडियक्रगणस्स तिन्‍्तेव कुलाइ' 0१४२१३४*

'स्थविर भद्रयशा भारद्वाज गोत्रीय से यहा ऋतुवाटिक& नामक गण - निकला, जिसकी ये चार शाखाएँ श्रौर